ब्यूरो रिपोर्ट: जहीन खान ✍️
बाराबंकी (सिद्धौर)। केंद्र सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) गांवों में गरीब मजदूरों को रोजगार देने का बड़ा माध्यम बन चुकी है। खासकर ग्राम पंचायत अशौरी और सेमारी में योजना का क्रियान्वयन ईमानदारी से हो रहा है, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूरों को काम दिया जा रहा है।
लेकिन कुछ लोग राजनीति की आड़ में मेहनतकश प्रधानों को बदनाम करने का काम कर रहे हैं, जो कि न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि लोकतंत्र और विकास कार्यों के खिलाफ भी है।
जब मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का अवलोकन किया गया, तो वहाँ मजदूरों की भारी संख्या में मौजूदगी दिखाई दी। मजदूरों से हुई बातचीत में उन्होंने स्पष्ट कहा कि –
"हमें जितना काम मिलता है, उतना मेहनताना भी मिलता है। जितने मजदूर काम करते हैं, उतनी ही हाजिरी चढ़ाई जाती है।"
यह बयान झूठे आरोपों का पूरी तरह खंडन करता है। इसके बावजूद कुछ लोग काम कर रहे प्रधानों को राजनीतिक द्वेषवश बदनाम करने में लगे हैं।
सवाल यह है कि जब प्रधान मेहनत और ईमानदारी से काम कर रहे हैं, मजदूर संतुष्ट हैं, तो उन्हें बदनाम करने की कोशिश क्यों? क्या केवल व्यक्तिगत रंजिश के चलते विकास कार्यों को बाधित करना उचित है?
समाज को इस सोच पर विचार करना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन बिना तथ्यों के मेहनती जनप्रतिनिधियों को कलंकित करना सरासर अनुचित है। ऐसे प्रयासों से न सिर्फ कार्यरत प्रधानों का मनोबल गिरता है, बल्कि ग्रामीण विकास भी बाधित होता है।
अब जरूरत इस बात की है कि समाज मेहनतकश जनप्रतिनिधियों के साथ खड़ा हो और राजनीति से ऊपर उठकर विकास को प्राथमिकता दे।
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