बिहार चुनाव 2025 में सीमांचल से पटना तक मुसलमानों का रुख तय करेगा सत्ता का रास्ता
पटना।
बिहार की सियासत में फिर से वही पुराना लेकिन सबसे गर्म सवाल उठ खड़ा हुआ है — “भाईजान किसके होंगे?”
2025 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही मुस्लिम वोट बैंक को लेकर राजनीतिक खेमों में हलचल मच गई है।
राजद (RJD) की परंपरागत पकड़ को चुनौती दे रही है असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज मुहिम भी नए समीकरण बनाने में जुटी है।
लालू प्रसाद यादव के दौर से लेकर आज तक RJD और मुसलमानों का रिश्ता सियासत का मजबूत सूत्र रहा है।
राजद हमेशा से "मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण" पर खड़ी रही है और यही उसकी चुनावी ताकत भी रही है।
2015 के चुनाव में करीब 80% मुस्लिम वोट महागठबंधन के पक्ष में गया था।
लेकिन अब वही वोट बैंक “अखंड” नहीं रहा। तेजस्वी यादव का चेहरा युवाओं में लोकप्रिय जरूर है, पर सीमांचल जैसे इलाकों में AIMIM के बढ़ते असर ने RJD को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 2020 में बिहार की सियासत में हलचल मचा दी थी।
किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जिलों में 5 सीटें जीतकर AIMIM ने यह साबित कर दिया कि मुसलमानों के बीच “अपनी पार्टी” का विचार अब जगह बना रहा है।
हालाँकि बाद में चार विधायक RJD में शामिल हो गए, लेकिन AIMIM का प्रभाव सीमांचल में कायम है।
ओवैसी ने हाल ही में कहा,
“बिहार के मुसलमान किसी के वोट बैंक नहीं, अपनी सियासी ताकत खुद तय करेंगे।”
यह बयान RJD के लिए चेतावनी है कि अब मुस्लिम वोट गैर-परंपरागत दिशा में भी जा सकते हैं।
भाजपा और जेडीयू की अगुवाई वाला NDA गठबंधन अब भी मुस्लिम वोट बैंक से दूर नज़र आता है।
2020 में NDA को सिर्फ 14% मुस्लिम वोट मिले थे।
नीतीश कुमार की नरम छवि और भाजपा की हिंदुत्व राजनीति — ये दोनों साथ में मुस्लिम मतदाताओं को पूरी तरह नहीं जोड़ पा रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि NDA मुसलमानों से ज्यादा अपने “कोर वोट बैंक” पर निर्भर है। इसलिए इस बार भी मुस्लिम वोट में बड़ी सेंध लगना मुश्किल दिखता है।
रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) अपने जनसुराज अभियान के जरिए "नई राजनीति" का नारा दे रहे हैं।
उनकी टीम सीमांचल और मिथिलांचल में लगातार कैम्पेन चला रही है।
PK कहते हैं —
“बिहार को जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर विकास की राजनीति चाहिए।”
हालाँकि अभी उनका संगठन ग्राउंड पर मजबूत नहीं दिखता, लेकिन मुस्लिम युवाओं में “तीसरा विकल्प” बनने की हल्की लहर ज़रूर है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मुस्लिम मतदाता अभी भी बड़ी संख्या में RJD-महागठबंधन के साथ हैं।
लेकिन AIMIM और जन सुराज जैसे विकल्पों की मौजूदगी से यह वोट अब पहले जैसा एकतरफा नहीं रहा।
सीमांचल में AIMIM, जबकि शहरी इलाकों में PK की मौजूदगी RJD के पारंपरिक समीकरण को झटका दे सकती है।
2025 के बिहार चुनाव में “भाईजान” सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि किंगमेकर बन चुके हैं।
किसे मिलेगा मुस्लिमों का भरोसा — RJD, AIMIM, या PK — यही तय करेगा पटना की सत्ता का रास्ता।
मुसलमान अब खुद को “वोट बैंक” नहीं, बल्कि “वोट ताकत” के रूप में देख रहे हैं।
🖊️ रिपोर्टर: मोहम्मद शोएब
📍 स्पेशल रिपोर्ट | सच की आवाज़ वेब न्यूज़ | बिहार चुनाव 2025
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