गोबरा में पेड़ कटान पर दरोगा आकाश के बयान से वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल


ब्यूरो चीफ आमिर मिर्जा, प्रयागराज ✍️

गोबरा, प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र की बारा तहसील अंतर्गत शंकरगढ़ वन विभाग के ग्राम सभा गोबरा में हरे-भरे चिल्बिल यानी चिरूल के पेड़ की कथित कटान और उसकी लकड़ी मौके से उठा ले जाने का मामला सामने आया है। घटना को लेकर वन संपदा की सुरक्षा और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

बताया जा रहा है कि कथित लकड़हारों ने पेड़ काटकर उसे धराशायी किया और उसकी पूरी लकड़ी मौके से उठा ले गए। मामले की जानकारी शंकरगढ़ वन विभाग के रेंजर को दी गई तो उन्होंने मामला संज्ञान में नहीं होने की बात कहते हुए उसे दिखवाने की बात कही।

दरोगा आकाश के ‘छूट’ वाले बयान से उठे सवाल

मामले में संबंधित हल्के के दरोगा आकाश से बातचीत की गई तो उनके द्वारा कथित तौर पर बताया गया कि लकड़ी “छूट” पर है। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि पेड़ काटने की अनुमति किसी परिस्थिति में दी गई थी, तो क्या उससे लकड़ी को मौके से उठाकर दूसरे स्थान पर ले जाने की भी स्वतः अनुमति मिल जाती है?

पेड़ की कटान की अनुमति और लकड़ी के परिवहन की वैधानिकता अलग-अलग विषय हो सकते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि गोबरा से काटी गई लकड़ी कहां ले जाई गई, पेड़ किसने काटा, कटान किस अनुमति के आधार पर हुई और लकड़ी के परिवहन के लिए आवश्यक दस्तावेज मौजूद थे या नहीं।

दस्तावेजों की जांच से साफ होगी स्थिति

चिल्बिल यानी चिरूल का वैज्ञानिक नाम Holoptelea integrifolia है। पेड़ की कटान को लेकर लागू नियम अपनी जगह हैं, लेकिन लकड़ी के परिवहन की वैधानिकता की भी जांच आवश्यक है।

यदि लकड़ी वैध रूप से काटी गई है तो संबंधित अनुमति और दस्तावेज सामने आने चाहिए। वहीं यदि लकड़ी को दूसरे स्थान पर ले जाया गया है तो उसके परिवहन से संबंधित वैध अभिलेखों की भी जांच होनी चाहिए। इसी आधार पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामले में नियमों का पालन हुआ है या नहीं।

निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल

मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि क्षेत्र में पेड़ काटकर उसकी पूरी लकड़ी उठा ली गई तो संबंधित वन अमले को इसकी जानकारी कब हुई। वन संपदा की निगरानी विभागीय अमले की जिम्मेदारी है, ऐसे में घटना की सूचना समय पर अधिकारियों तक नहीं पहुंचने के कारणों की भी जांच जरूरी बताई जा रही है।

रेंजर द्वारा मामले को संज्ञान में लेकर जांच कराने की बात कही गई है। ऐसे में बिना जांच किसी अधिकारी की भूमिका पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। हालांकि दरोगा आकाश द्वारा बताई गई “छूट” किस नियम, अनुमति या अभिलेख के आधार पर है, यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है।

उच्च अधिकारियों से भी जांच की मांग

मामले में संबंधित प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) स्तर से यह स्पष्ट किया जाना अपेक्षित है कि क्षेत्र में वन संपदा की निगरानी किस व्यवस्था के तहत की जा रही है और घटना की जानकारी विभागीय स्तर तक कब पहुंची।

यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित जिम्मेदारी तय किए जाने की आवश्यकता होगी। वहीं यदि कटान और लकड़ी का परिवहन पूरी तरह नियमों के अनुरूप पाया जाता है तो दस्तावेजों की जांच के बाद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

फिलहाल गोबरा का मामला केवल एक पेड़ की कटान तक सीमित नहीं है, बल्कि वन संपदा की सुरक्षा, लकड़ी के स्रोत एवं परिवहन की वैधानिकता और विभागीय निगरानी व्यवस्था से जुड़े सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि जांच की कार्रवाई केवल लकड़ी काटने वालों तक सीमित रहती है या निगरानी व्यवस्था की भी पड़ताल की जाती है।

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