मोहर्रम के चांद के साथ शुरू हुआ नजरों-नियाज़ का सिलसिला, दरगाह शरीफ में हुई दुआएं

ब्यूरो रिपोर्ट: जहीन खान ✍️

बहराइच। जैसे ही मोहर्रम उल हराम का चांद नजर आया, वैसे ही दरगाह सैयद सालार मसूद गाजी रह. के प्रांगण में नाल दरवाजे के पास परंपरागत नजरों-नियाज़ और दुआओं का सिलसिला शुरू हो गया। हर साल की तरह इस वर्ष भी मुहर्रम का आगाज़ अलम कुशाई के साथ हुआ, जहां शाही इमाम अरशदुल कादरी ने दुआ कर इमाम हुसैन अलै. की शहादत को याद किया।

इस मौके पर सैकड़ों अकीदतमंदों की मौजूदगी में माह-ए-मोहब्बत और शहादत का पैग़ाम फैलाने वाली परंपराओं को जीवंत किया गया। लोगों ने गाज़ी मियां की दरगाह पर नजरों-नियाज़ पेश कर भाईचारे, अमन और इमाम हुसैन की कुर्बानी को सलाम किया।

मोहर्रम का महत्व:

मोहर्रम इस्लामी वर्ष का पहला महीना होता है, जिसे गम और सब्र का महीना माना जाता है। इसी महीने की 10वीं तारीख को कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने यज़ीद की फौज से लड़ते हुए शहादत दी थी। इस घटना को याद करते हुए शिया समुदाय मातम, ताजियादारी और जुलूसों के माध्यम से अपने गम और श्रद्धा को प्रकट करता है।

गाज़ी मियां की दरगाह से भाईचारे का संदेश:

दरगाह सैयद सालार मसूद गाजी रह. न सिर्फ अकीदत का केंद्र है, बल्कि यहां से हर वर्ष सांप्रदायिक सौहार्द, प्रेम और इंसानियत का पैग़ाम भी दिया जाता है। नजरों-नियाज़ के जरिए लोगों ने इमाम हुसैन की कुर्बानी से सबक लेने और समाज में अमन कायम रखने की दुआएं मांगीं।

बहराइच की यह परंपरा यह दिखाती है कि कैसे धार्मिक आयोजन समाज को जोड़ने और इंसानियत की राह पर चलने का संदेश देते हैं।

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