विशेष संवाददाता: लखनऊ
लखनऊ। भिक्षावृत्ति उन्मूलन को लेकर जिलाधिकारी द्वारा चलाया गया सराहनीय अभियान आज सवालों के घेरे में है। भिखारियों को चिन्हित कर उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने की पहल, और संगठित भिक्षावृत्ति गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई का संकल्प, ज़मीनी हकीकत में अधूरा और खोखला साबित होता दिख रहा है।
शुरुआत में प्रशासनिक जोश और फोटो सेशन तक सीमित इस अभियान में स्थानीय पुलिस और नगर निगम की उदासीनता साफ तौर पर देखी जा सकती है। अभियान कब खत्म हो गया, इसकी जानकारी तक न तो आमजन को है और न ही जिम्मेदार विभागों को कोई चिंता।
आज भी लखनऊ की सड़कों पर छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भीख मांगते नज़र आते हैं, जो इस अभियान की विफलता की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। पुलिस और नगर निगम की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं — जिन्होंने इस अभियान को सिर्फ दिखावे की खानापूर्ति बनाकर रख दिया।
ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदारों ने कुछ समय के लिए डीएम के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाने और वाहवाही लूटने तक ही सीमित कर दिया, जबकि अभियान का वास्तविक उद्देश्य भिखारियों को आत्मनिर्भर बनाना और माफियाओं पर नकेल कसना था।
सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का वादा आज सिर्फ कागज़ों में सिमट गया है, और जिन गरीबों के लिए ये अभियान था, वो आज भी पेट भरने की जद्दोजहद में सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं।
जरूरत है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति को ज़मीनी स्तर तक ईमानदारी और निरंतरता से लागू किया जाए, वरना ये अभियान भी अन्य सरकारी दिखावों की तरह इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।
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