स्टेट हेड योगेंद्र सिंह यादव, उत्तर प्रदेश ✍️
शाहजहांपुर। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया की ओर से वन विभाग, जिला गंगा समिति के सदस्यों, कछुआ मित्रों और स्थानीय स्वयंसेवियों के लिए कछुआ संरक्षण एवं नदी जैव विविधता विषय पर तकनीकी प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन वन एवं गंगा सभागार में किया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य कछुओं के वैज्ञानिक संरक्षण, पुनर्वास, निगरानी, जैवमितीय अभिलेखीकरण और नदी पारिस्थितिकी तंत्र में जनसहभागिता की भूमिका के संबंध में फील्ड स्तर के कार्मिकों एवं समुदाय को तकनीकी जानकारी देना रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ हिमांशु बाबल, भारतीय वन सेवा बैच 2024 एवं उप प्रभागीय वनाधिकारी डॉ. सुशील कुमार ने प्रतिभागियों के परिचय के साथ किया। आयोजक डॉ. गौरा चन्द्र दास एवं डॉ. आमान उल्ला खाँ ने अतिथियों का बुके एवं पौध भेंट कर स्वागत किया।
कार्यशाला में वन विभाग की विभिन्न रेंजों के फील्ड स्तरीय कार्मिकों के साथ लोक भारती, हरित सारथी, ग्राम पाहरूआ के कछुआ मित्रों और स्वयंसेवियों ने प्रतिभाग किया।
हिमांशु बाबल ने कहा कि नदियां देश की जीवनरेखा हैं। नदियों में पाए जाने वाले जलीय जीव और जैव विविधता नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण घटक हैं। उन्होंने जलीय जीवों के संरक्षण को नदी पारिस्थितिकी और मानव स्वास्थ्य से जुड़े व्यापक पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ते हुए सामुदायिक सहभागिता पर जोर दिया।
डॉ. सुशील कुमार ने ग्राम पाहरूआ में कछुआ संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने स्थानीय समुदाय, कछुआ मित्रों और फील्ड कार्मिकों से मीठे एवं स्वच्छ जल में पाए जाने वाले कछुओं के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
डॉ. गौरा चन्द्र दास ने गंगा एवं उसकी सहायक नदियों में पाई जाने वाली जैव विविधता, जलीय जीवों और नदी पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न घटकों की जानकारी दी। उन्होंने डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया द्वारा वन विभाग के सहयोग से घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और कछुओं सहित प्रमुख जलीय जीवों के संरक्षण एवं निगरानी के लिए अपनाई जा रही प्रणालियों के बारे में बताया।
डॉ. आमान उल्ला खाँ ने गंगा नदी तंत्र में पाई जाने वाली विभिन्न कछुआ प्रजातियों की पहचान, उनके आवास और संरक्षण के प्रमुख बिंदुओं पर प्रशिक्षण दिया। उन्होंने जनपद शाहजहांपुर के विकासखंड जलालाबाद स्थित ग्राम गोरा में जिला गंगा समिति एवं वन विभाग के सहयोग से संचालित कछुआ संरक्षण कार्यक्रम की चरणबद्ध प्रक्रिया भी समझाई।
प्रशिक्षण के दौरान इंडियन टेंट टर्टल एवं इंडियन रूफ्ड टर्टल के संरक्षण, पालन-पोषण, स्वास्थ्य निगरानी, जैवमितीय रिकॉर्डिंग तथा प्राकृतिक आवास में पुनर्वास के दौरान अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक सावधानियों की जानकारी दी गई।
रामौतार निषाद ने प्रतिभागियों को कछुआ नर्सरी का स्थलीय निरीक्षण कराया। इस दौरान कछुओं के आकार, वजन एवं वृद्धि की निगरानी, भोजन प्रबंधन तथा नर्सरी स्तर पर आवश्यक देखभाल और अभिलेखीकरण की प्रक्रिया की व्यावहारिक जानकारी दी गई।
कार्यक्रम का संचालन जिला परियोजना अधिकारी डॉ. विनय कुमार सक्सेना ने किया। समापन अवसर पर आयोजकों ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में आलोक मिश्रा, मो. खालिद, प्रेमसरन शर्मा, नवील, आदेश सहित अन्य सहयोगियों की विशेष भूमिका रही।
