स्टेट ब्यूरो हेड योगेंद्र सिंह यादव, उत्तर प्रदेश ✍️
सीडीओ और जिला कृषि अधिकारी ने खेत का निरीक्षण कर पराली प्रबंधन, जैविक खेती और जल संरक्षण मॉडल की जानकारी ली
शाहजहांपुर। विकासखंड पुवायां की ग्राम पंचायत बिलसड़ी खुर्द में लोक भारती के तत्वावधान में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विशेष प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ), जिला कृषि अधिकारी (डीएओ) तथा लोक भारती के सदस्य संजय उपाध्याय, विजय पाठक और राजीव सिंह मौजूद रहे। ग्राम पंचायत बिलसंडी के प्रधान संजय त्रिपाठी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्थानीय शिव मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ किया गया।
प्राकृतिक खेती और पराली प्रबंधन का संदेश
कार्यक्रम के दौरान जिला कृषि अधिकारी ने किसानों से पराली नहीं जलाने की अपील की। उन्होंने पराली को खेत में ही उपयोग कर जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करने का संदेश दिया।
इसके बाद अधिकारियों ने किसान लक्ष्मी कांत के खेत का निरीक्षण किया, जहां जैविक विधि से सब्जियों की खेती की जा रही है। मुख्य विकास अधिकारी ने प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले जीवामृत, घन जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र तैयार करने की प्रक्रिया का भी अवलोकन किया।
खेत पर पाली जा रही गायों का टीकाकरण कर उनका सम्मान किया गया और उन्हें गुड़ एवं चना खिलाकर गोसेवा की गई।
मस्तान घाट पर चौका पद्धति का निरीक्षण
प्राकृतिक खेती के निरीक्षण के बाद अधिकारियों का दल मस्तान घाट पहुंचा, जहां राजस्थान के पद्मश्री राजा लक्ष्मण सिंह की प्रसिद्ध चौका पद्धति पर आधारित जल एवं मृदा संरक्षण मॉडल का निरीक्षण किया गया।
इस पद्धति के तहत ढलान की दिशा में छोटे-छोटे चौकोर गड्ढे बनाए जाते हैं, जिनमें वर्षा का पानी एकत्र होता है। इससे मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद मिलती है। संचित पानी पशुओं के पीने के काम आता है, जबकि आसपास उगने वाली प्राकृतिक घास पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी होती है।
इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी ने मस्तान घाट परिसर में पौधारोपण भी किया।
एफपीओ गठन और वैज्ञानिक अध्ययन के निर्देश
मुख्य विकास अधिकारी ने स्थानीय किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) गठित कराने के निर्देश दिए।
उन्होंने मस्तान घाट पर विकसित जल संरक्षण की चौका पद्धति का वैज्ञानिकों के माध्यम से वैज्ञानिक अध्ययन एवं दस्तावेजीकरण कराने को कहा, ताकि इस मॉडल को अन्य किसान भी समझ सकें और आवश्यकता के अनुसार अपनाया जा सके।
