तीर्थस्थल सिर्फ पूजा के केंद्र नहीं, हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और चेतना का आधार हैं”: सतीश महाना

ब्यूरो चीफ आमिर मिर्ज़ा, प्रयागराज ✍️

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को पर्यटन विकास, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आधुनिक तकनीक से जोड़ने के उद्देश्य से गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (NCZCC), प्रयागराज में उत्तर प्रदेश दर्शन समिट 2026 का आयोजन किया गया। डेवलपमेंट लीडर्स अलायंस (DLA) की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई दिशा देने और उत्तर प्रदेश को वैश्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर मंथन हुआ।

वीज़ा इंक के सहयोग और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) की सहभागिता से आयोजित सम्मेलन का केंद्रीय विषय ‘उत्तर प्रदेश: जहाँ आस्था का भविष्य से मिलन होता है’ रहा। इसमें आध्यात्मिक जगत, शासन, उद्योग, शिक्षा, पर्यटन, संस्कृति और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लेकर पर्यटन विकास के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे।

आध्यात्मिक विरासत और आधुनिक विकास का संगम

कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के साथ हुआ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर आचार्य श्रीकांत मिश्रा, जिला पंचायत अध्यक्ष वी.के. सिंह, महापौर गणेश केसरवानी, राहुल कपाड़िया, डॉ. चंद्रदेव मिश्र, राजेश केसरवानी और कमलेश मिश्रा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

मुख्य अतिथि सतीश महाना ने उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को प्रदेश की विशिष्ट पहचान तथा विकास की महत्वपूर्ण शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि तीर्थस्थल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामूहिक चेतना के आधार हैं।

उन्होंने सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने पर जोर दिया। महाना ने भारतीय संस्कृति को मानवता, सद्भाव और संस्कारों की दिशा देने वाली परंपरा बताते हुए कहा कि देश की ऋषि-मुनियों, संतों और महापुरुषों की विरासत को आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

धार्मिक परंपराओं और मर्यादाओं का संरक्षण जरूरी

प्रमुख वक्ता आचार्य श्रीकांत मिश्रा ने तीर्थस्थलों की धार्मिक परंपराओं और मौलिक पहचान को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक पर्यटन का विकास श्रद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए, लेकिन इसके साथ प्राचीन परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं का सम्मान भी बनाए रखना जरूरी है।

विशिष्ट अतिथि एवं प्रयागराज के जिला पंचायत अध्यक्ष वी.के. सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने तीर्थस्थलों से जुड़े गांवों में आधारभूत सुविधाओं, संपर्क मार्गों और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ ग्रामीण समुदायों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।

डिजिटल भुगतान और तकनीक से बढ़ेंगे अवसर

वीज़ा के प्रतिनिधि राहुल कपाड़िया ने पर्यटन क्षेत्र में डिजिटल भुगतान, तकनीकी नवाचार और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक भुगतान व्यवस्थाओं के जरिए स्थानीय व्यापारियों और छोटे उद्यमों को पर्यटन से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिल सकता है।

सच्चा बाबा आश्रम के डॉ. चंद्रदेव मिश्र ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में तीर्थयात्रा के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय महत्व पर विचार रखे। उन्होंने पर्यटन के विस्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई।

आस्था से स्थानीय रोजगार और आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य

कार्यक्रम के संयोजक एवं डेवलपमेंट लीडर्स अलायंस के संस्थापक संकल्प शुक्ल ने दर्शन पहल का उद्देश्य बताते हुए कहा कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत केवल गौरवशाली अतीत की पहचान नहीं, बल्कि भविष्य के आर्थिक और सामाजिक विकास का भी महत्वपूर्ण आधार है।

उन्होंने कहा कि पर्यटन का उद्देश्य केवल तीर्थस्थलों पर पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि इससे स्थानीय युवाओं, महिलाओं, कारीगरों, छोटे व्यापारियों और आसपास के गांवों को भी आर्थिक अवसर मिलने चाहिए। आस्था से पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।

संकल्प शुक्ल ने प्रयागराज, काशी, अयोध्या, मथुरा और प्रदेश के अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों को एक समग्र पर्यटन व्यवस्था से जोड़ने की संभावनाओं पर भी जोर दिया। उन्होंने बेहतर आधारभूत सुविधाओं, कुशल मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक, पर्यावरण संरक्षण और संस्थागत समन्वय को पर्यटन विकास के लिए आवश्यक बताया।

उन्होंने कहा कि DARSHAN पहल के माध्यम से संवाद को ठोस नीतिगत सुझावों, संस्थागत सहयोग और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में बदलने का प्रयास किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों से प्राप्त अनुभवों को व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से जोड़ते हुए वर्ष 2047 तक भारत को वैश्विक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन में अग्रणी स्थान दिलाने की परिकल्पना रखी गई।

कई गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति

कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर रंजना त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर आचार्य कमलेश, डॉ. मृत्युंजय राव, रश्मि त्रिपाठी, राजेश केसरवानी, दत्तात्रेय पांडे, पंडित राजेश शर्मा, शशांक शेखर पांडे, अजय अग्रहरि सहित अनेक लोग मौजूद रहे।

सम्मेलन में आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण, आधुनिक तकनीक के उपयोग, स्थानीय रोजगार और पर्यटन सुविधाओं के विस्तार को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। आयोजन के जरिए उत्तर प्रदेश के धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों को पर्यटन, सामाजिक विकास और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया।

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