ब्यूरो रिपोर्ट आमिर मिर्ज़ा, प्रयागराज ✍️
प्रयागराज, 30 अक्टूबर 2026। किसी गरीब परिवार का बेटा जब कानून की पढ़ाई पूरी कर काला कोट पहनने का सपना देखता है, तो उसके पीछे वर्षों की मेहनत, माता-पिता का त्याग और पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। लेकिन वकालत के पेशे में प्रवेश के दौरान अतिरिक्त प्रक्रियाओं और आर्थिक बोझ का सामना करना पड़े, तो युवा अधिवक्ताओं के भविष्य को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी मुद्दे को लेकर इलाहाबाद जन कल्याण समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ समाजसेवी मोहम्मद हन्जला ने आवाज बुलंद की है।
मोहम्मद हन्जला ने एडीएम सिटी, प्रयागराज के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष को ज्ञापन भेजकर अधिवक्ताओं के पेशे में प्रवेश से जुड़ी कुछ प्रक्रियाओं पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से COP (Certificate of Practice) की अनिवार्य प्रक्रिया और नए अधिवक्ताओं के लिए प्रस्तावित छह माह की अनिवार्य इंटर्नशिप को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
वकालत का सपना आर्थिक मजबूरी की भेंट न चढ़े
मोहम्मद हन्जला का कहना है कि वकालत केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण पेशा है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के अनेक युवा कठिन आर्थिक परिस्थितियों में कानून की पढ़ाई पूरी करते हैं। ऐसे में पेशे की शुरुआत में अतिरिक्त खर्च और औपचारिकताओं का बोझ उनके लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई युवा कानून की पढ़ाई पूरी कर आवश्यक शैक्षणिक योग्यता हासिल कर लेता है, तो पेशेवर जीवन की शुरुआत को अनावश्यक आर्थिक और प्रक्रियागत बाधाओं से क्यों कठिन बनाया जाए?
ज्ञापन में उठाईं छह प्रमुख मांगें
मोहम्मद हन्जला ने अपने ज्ञापन में निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
- COP (Certificate of Practice) की अनिवार्य प्रक्रिया समाप्त करने की दिशा में पहल की जाए।
- नए अधिवक्ताओं के लिए प्रस्तावित छह माह की अनिवार्य इंटर्नशिप पर पुनर्विचार किया जाए।
- वकालत शुरू करने में बाधा बनने वाली अनावश्यक अतिरिक्त औपचारिकताओं को समाप्त किया जाए।
- अधिवक्ताओं के पंजीकरण और पेशे में प्रवेश की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और कम खर्चीली बनाई जाए।
- किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले युवा अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाए।
- राष्ट्रपति संबंधित सक्षम विधिक संस्थाओं का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित करें और युवा अधिवक्ताओं के हित में आवश्यक पहल हो।
बोले- यह लड़ाई हजारों युवाओं के भविष्य की है
मोहम्मद हन्जला ने कहा कि यह आवाज किसी एक व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं से जुड़ी है जो आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि वकालत में प्रशिक्षण, अनुशासन और योग्यता का महत्व अपनी जगह है, लेकिन ऐसी व्यवस्थाओं पर भी विचार होना चाहिए जो आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए अतिरिक्त बाधा बन सकती हैं।
भावुक अपील—काला कोट अमीरों की विरासत नहीं
मोहम्मद हन्जला ने कहा,
“किसी गरीब मां का बेटा जब काला कोट पहनने का सपना देखता है, तो उसकी आंखों में केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। वह भी चाहता है कि एक दिन न्यायालय में खड़ा होकर किसी गरीब, मजलूम और बेसहारा इंसान को न्याय दिलाए। क्या उसका सपना केवल इसलिए अधूरा रह जाए कि उसके परिवार के पास अतिरिक्त प्रक्रियाओं और खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है? काला कोट किसी अमीर परिवार की विरासत नहीं, बल्कि हर योग्य युवा का सपना है।”
सामाजिक मुद्दों को शासन और प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास
मोहम्मद हन्जला के अनुसार, वह उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न सामाजिक मुद्दों को संबंधित प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंचाने का प्रयास करते रहे हैं। समाचार पत्रों में भी उनके सामाजिक सरोकारों और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने के प्रयासों का उल्लेख किया जाता रहा है।
इस बार उन्होंने युवा अधिवक्ताओं के पेशेवर भविष्य और आर्थिक कठिनाइयों से जुड़े विषय को राष्ट्रपति तथा बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष रखा है।
अब संबंधित संस्थाओं के फैसले पर निगाहें
मोहम्मद हन्जला ने राष्ट्रपति, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से अपील की है कि युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया जाए। उनका कहना है कि अधिवक्ताओं को मजबूत बनाने से न्याय व्यवस्था भी मजबूत होगी।
उनका स्पष्ट संदेश है—“वकालत को महंगा नहीं, आसान बनाइए। काला कोट पहनने का सपना देखने वाले गरीब के बेटे के रास्ते में आर्थिक और अनावश्यक प्रक्रियागत दीवारें खड़ी मत कीजिए। न्याय के मंदिर तक पहुंचने का अवसर हर योग्य युवा को मिलना चाहिए।”
अब देखना होगा कि इस ज्ञापन पर संबंधित संस्थाएं क्या रुख अपनाती हैं और युवा अधिवक्ताओं की मांगों पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है।
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