शाहजहाँपुर, 13 फरवरी 2026।
रेशम उद्योग एक तकनीकी प्रकृति का कार्य है जिसमें गरीब, मजदूर, कृषक से लेकर बड़े उद्यमी तक सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। जलवायु और भौगोलिक दृष्टि से में रेशम उत्पादन एवं उसके विकास की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रेशम विभाग ने नई रणनीति के साथ कार्यवाही प्रारम्भ की है।
प्रदेश सरकार ने केंद्र एवं राज्य पोषित योजनाओं का लाभ प्राप्त करने वाले लाभार्थियों के लिए पारदर्शी सुविधा उपलब्ध कराने हेतु “रेशम मित्र पोर्टल” के माध्यम से ऑनलाइन पंजीकरण व्यवस्था लागू की है। साथ ही मार्केटिंग मॉड्यूल के अंतर्गत रेशम कोया उत्पादकों और कृषकों को उचित मूल्य, समयबद्ध विक्रय तथा पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। ककून की गुणवत्ता के अनुसार न्यूनतम विक्रय मूल्य निर्धारण के लिए के वैज्ञानिकों व अधिकारियों के समन्वय से जनपद स्तर पर समितियों के गठन की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हो चुकी है।
प्रदेश में उत्पादित ककून से रेशमी धागा राज्य के भीतर ही तैयार हो और उसकी स्थानीय खपत बढ़े, इसके लिए मल्टीएंड रीलिंग इकाइयों की स्थापना की जा रही है। साथ ही रेशम उद्योग के प्रचार-प्रसार, शुद्ध रेशमी वस्त्रों की पहचान और उत्पादन संबंधी गतिविधियों की जानकारी देने के उद्देश्य से “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” स्थापित करने की पहल की गई है, जहाँ प्रदर्शनी के साथ रेशमी वस्त्रों के विक्रय हेतु शोरूम भी उपलब्ध रहेगा। एनजीओ, एफपीओ समितियों तथा स्वयं सहायता समूहों को भी रेशम उत्पादन से जोड़ने के प्रयास तेज़ किए गए हैं।
वन विभाग, पंचायती राज, सिंचाई, पीडब्ल्यूडी, एनएचएआई और ग्राम विकास विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर रेशम कृषि का विस्तार किया जा रहा है। विभागीय प्रयासों का परिणाम है कि पिछले नौ वर्षों में प्रदेश का रेशम निर्यात 9.11 करोड़ रुपये से बढ़कर 251.65 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है, जो लगभग 28 गुना वृद्धि दर्शाता है।
रेशम उद्योग कृषि आधारित कुटीर उद्योगों में अग्रणी स्थान रखता है। प्रदेश में शहतूती, टसर और अरण्डी—तीनों प्रकार का रेशम उत्पादन किया जा रहा है। वर्ष 1987 में रेशम निदेशालय की स्थापना तथा 1988 से लखनऊ में इसके संचालन के बाद इस क्षेत्र में निरंतर विस्तार हुआ है। वर्तमान में प्रदेश में 231 राजकीय रेशम फार्म स्थापित हैं और रेशम की खपत उत्पादन से अधिक है, जिससे उत्पादन, धागाकरण, बुनाई, डिज़ाइनिंग और निर्यात के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएँ बन रही हैं।
रेशम उत्पादकों को उच्च गुणवत्ता उत्पादन हेतु सहयोग प्रदान किया जा रहा है। इसी क्रम में वर्ष 2025-26 से “मुख्यमंत्री रेशम विकास योजना” प्रारम्भ की गई है, जिसके अंतर्गत कृषकों की निजी भूमि पर शहतूत वृक्षारोपण कर रेशम धागे के अतिरिक्त उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा।
इस प्रकार रेशम उद्योग न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रहा है, बल्कि रोजगार सृजन और निर्यात वृद्धि के माध्यम से प्रदेश की आर्थिक प्रगति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
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