शिक्षा से अधिक शक्तिशाली कोई हथियार नहीं है और दृढ़ निश्चय के साथ कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। हमारे आत्मसम्मान को नष्ट कर हमें अपनी समृद्ध परंपरा से विमुख करने का प्रयास किया गया, जिसके कारण हमने स्वयं अपने ज्ञान को नकार दिया और उसके दुष्परिणाम स्वरूप गुलामी झेली। ये विचार महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के सेवानिवृत्त संकायाध्यक्ष प्रो. एन.एन. पांडेय ने व्यक्त किए।
वे स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के शिक्षक शिक्षा विभाग एवं भारतीय शिक्षा शोध संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एकदिवसीय शैक्षिक संगोष्ठी “भारतीय ज्ञान परंपरा : आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला” को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने पहली बार भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि को स्वीकार किया है, जो वर्तमान समय में मार्गदर्शक बन सकती है। भारतीय परंपरा में ज्ञान का संरक्षण और हस्तांतरण अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, इसलिए प्रत्येक ज्ञान क्षेत्र में भारत की सशक्त उपस्थिति थी।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रो. रमेशधर द्विवेदी (यू.पी. कॉलेज, वाराणसी) ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने ग्रह-नक्षत्रों की गति और चिकित्सा विज्ञान को प्राचीन काल में ही समझ लिया था, किंतु आक्रांताओं द्वारा पांडुलिपियों के नष्ट होने से ज्ञान परंपरा को क्षति पहुँची। उन्होंने भारतीय ज्ञान को पुनः संकलित कर आधुनिक पाठ्यक्रम से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्य वक्ता प्रो. सी.एस. शुक्ल (वर्धमान कॉलेज, बिजनौर) ने कहा कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति है और ज्ञान मनुष्य के तीसरे नेत्र के समान है। उन्होंने भारतीय परंपरा की सार्वभौमिक भावना पर प्रकाश डाला।
मुमुक्षु शिक्षा संकुल के मुख्य अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती ने अपने आशीर्वचन में कहा कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को तैयार करना आवश्यक है। शिक्षा तभी सफल है जब वह सामाजिक, पारिवारिक और राष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान देने में सक्षम हो। उन्होंने संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करने और अंत्योदय की भावना को मजबूत करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बी.एड. छात्राओं की सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत से हुआ। प्रो. प्रभात शुक्ल ने मुख्य अतिथि को अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट किया। डॉ. मनोज मिश्र, डॉ. अखिलेश तिवारी, डॉ. राहुल शुक्ला, डॉ. अरविंद शुक्ल और डॉ. शिशिर शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री ने किया, जबकि स्वागत भाषण प्राचार्य प्रो. आर.के. आजाद और धन्यवाद ज्ञापन सचिव प्रो. अवनीश मिश्र ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर प्रो. सी.एस. शुक्ल की पुस्तकों “शिक्षा मनोविज्ञान” एवं “भारतीय एवं पाश्चात्य शिक्षाविद”, तथा प्रो. मीना शर्मा और डॉ. शैलजा मिश्रा की संयुक्त कृति “अधिगम और अभिप्रेरणा का मनोविज्ञान” का विमोचन स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में डॉ. विनीत श्रीवास्तव, डॉ. सौरभ मिश्रा, डॉ. राजीव यादव, डॉ. बृजनिवास, डॉ. रेनू बहुखंडी, डॉ. प्रियंका शर्मा, डॉ. रामऔतार सिंह, डॉ. अमित गुप्ता, डॉ. रोहित कुमार सिंह, नेहा कुमारी, प्रिया शर्मा सहित शिक्षक-शिक्षार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण, संरक्षण और समसामयिक उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
लखनऊ
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