सीतापुर: मकर संक्रांति जैसे पावन पर्व के दिन, जब ग्रामीण क्षेत्र में उत्सव और उल्लास का माहौल रहता है, उसी दिन विकास खंड सकरन में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े के आरोप सामने आए हैं। यह स्थिति केंद्र और राज्य सरकार की “विकसित भारत” की परिकल्पना पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
आरोप है कि ग्राम पंचायत अंगरासी, पखानियापुर, बरछता, सेमराकला, बेलवा बसहिया, भैसहा, झउवा कला, कम्हरिया महरिया, मदनापुर, कौवाखेरा और सुमरावा में सैकड़ों मजदूर काम के नाम पर दर्ज किए गए, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही निकली। रोजगार सेवकों की कथित लापरवाही या जानबूझकर की गई गलतियों को तकनीकी सहायक और एपीओ द्वारा नजरअंदाज किया गया, जिससे लाखों रुपये की सरकारी धनराशि के दुरुपयोग का आरोप लगाया जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार, ग्राम पंचायत सुमरावा में एक ही दिन में 13 मास्टर रोल के माध्यम से 130 मजदूरों की उपस्थिति दर्शाई गई। कई मास्टर रोल में महिला मजदूरों के नाम दर्ज पाए गए, जबकि अपलोड की गई तस्वीरों में पुरुष नजर आए। इसी तरह अन्य ग्राम पंचायतों में भी महिला मजदूरों के नाम पर पुरुषों की तस्वीरें, एक ही महिला की फोटो का बार-बार उपयोग और ऐसे लोगों की तस्वीरें सामने आईं जो वास्तव में मजदूरी करते ही नहीं हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि भैसहा में अधिकांश कार्य ठेकेदारी व्यवस्था के तहत कराया जा रहा है, जबकि कागजों में मजदूरों की संख्या पूरी दर्शाई जाती है। झउवा कला, कौवाखेरा और कम्हरिया महरिया में भी मास्टर रोल और फोटो में भारी विसंगतियां पाई गईं, जिससे पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह फर्जीवाड़ा केवल रोजगार सेवक तक सीमित नहीं हो सकता। प्रति डिमांड हस्ताक्षर करने वाले पंचायत सचिव, एमबी करने वाले कर्मचारी, कार्य की पुष्टि करने वाले अधिकारी और ग्राम प्रधान की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
अब बड़ा सवाल यह है कि इतने व्यापक स्तर पर सामने आए इन आरोपों पर प्रशासन कब ठोस कार्रवाई करेगा, या फिर मनरेगा में भ्रष्टाचार का यह सिलसिला कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा। ग्रामीणों ने उच्च स्तरीय जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
लखनऊ
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